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प. पू. मुनि श्री १०८ सुधा सागर जी एवं श्री १०८ प्रमाण सागर जी महाराज

 1. युवाओं को चाहिए कि वो अच्छी संख्या में धार्मिक क्रियाओं में सम्मलित हों । इससे बड़े , बूढ़े लोग अपने आप सुधरने लगेंगे ।

2. शास्त्रानुसार हर श्रावक को हमेशा एक मृदु वस्त्र अपने पास रखना चाहिए जीव रक्षा के लिए । जैसे कोई मक्छर शरीर पर बैठ जाए तो उसको हटाने के लिए । और पानी छानने का छन्ना भी हमेशा अपने पास रखना चाहिए ।

मुनियों के उपकरण पीक्षी और कमंडल को कभी भी श्रावकों को अपने प्रयोग में नहीं लानी चाहिए ।

3. *आज हमारा दुर्भाग्य है कि सुबह मंदिरों में भगवान् का प्रथम दर्शन बागवान करता है ।*

4. *पुरे भारत में एक भी जैन संस्था ऐसी नहीं है जो लौकिक शिक्षा में पढ़ाए जा रहे जैनो के गलत इतिहास को ठीक कराने के लिए ध्यान दे ।*

5. चिड़ियाघर आदि में पशुओं को बांधकर रखना आदि सर्वथा गलत है । और उनको देखकर मनोरंजन करना सर्वथा गलत है ।

6. *आगम में क्षत्रियों और जैनियों को नोकरी करने का कोई विधान ही नहीं है । उत्तम खेती , मध्यम व्यापर है ।* नोकरी के चक्कर में बच्चों को होस्टल आदि में जाकर क्या क्या नहीं खाना पड़ता । इसके पीछे 90% माँ बाप ही दोषी हैं । अगर माँ बाप सुधर जाएँ तो बच्चे अपने आप सुधर जाएंगे ।

7. भगवान्, गुरु और माँ बाप से अपेक्षाएं limited रखे ।

8. *विधवा स्त्री को सवा महीने तक मंदिर ना जाने देना रूडी है , आगम में ऐसा कोई विधान नहीं है।* सूतक का पालन करिये लेकिन बाहर से दर्शन कराया जा सकता है ।

9. बच्चों को हमेशा माँ बाप के ऋणों को याद करना चाहिए । तब फिर वो कभी उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता ।

*- प. पू. मुनि श्री १०८ सुधा सागर जी एवं श्री १०८ प्रमाण सागर जी महाराज*

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