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भगवान महावीर के प्र मुख सिद्धांत

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 सामान्य रूप से तो भगवान महावीर ने अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है, मुख्य रूप से 4 का कथन आता है।
   1- *आचार में अहिंसा*
   2- *विचारों में अनेकांत*
   3- *वाणी में स्याद्वाद*
   4- *जीवन में अपरिग्रह*
 *आचार में अहिंसा*
 सामान्यतः कहा जाता है हिंसा का न होना अहिंसा है। परन्तु जैन दर्शन में अहिंसा रूप बहुत विस्तृत है।
         निश्चय से आत्मा में राग-द्वेष की उत्पत्ति न होना ही अहिंसा है। और व्यवहार से मन-वचन-काय से , कृत- कारित-अनुमोदना किसी भी रूप में किसी भी जीव को पीड़ा या दुख न पहुँचाना अहिंसा है।
             वहाँ केवल पंचेन्द्रिय जीवों की हिंसा की बात नहीं कही वरन् सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा का भी उपदेश दिया। 
            सुबह से शाम तक होने वाली क्रियाओं में हिंसा , अभक्ष्य भक्षण में हिंसा , अनछने जल के उपयोग में हिंसा — यदि आज हम इन हिंसाओं से बचे हैं तो वो अहिंसा का सिद्धांत ही है जिसने जीव मात्र के प्रति दया का भाव सिखाया।
               भगवान महावीर ने न केवल आचार में अहिंसा की बात कही बल्कि भावों में भी अहिंसा का प्रतिपादन किया।
           आचार में और भावों में अहिंसा का प्रवर्तन होने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
*विचारों में अनेकांत*
                 अनेक + अंत = अनेकांत । अर्थात् अनेक यानि बहुत और अंत यानि धर्म।
              प्रत्येक वस्तु अनेक धर्मात्मक है। एक ही वस्तु में परस्पर विरोधी दो धर्मों या शक्तियों का प्रकाशित होना अनेकांत है। अर्थात् जो वस्तु एक है वही अनेक भी है , जो नित्य है वही अनित्य भी है , जो सत् है वही असत् भी है।
            अनेकांत के बिना वस्तु की सिद्धि नहीं हो सकती। जब हम वस्तु के एक धर्म को स्वीकार करते है, तो विवाद खड़ा होता है। कैसे ? यदि हम वस्तु को हमेशा सत् रूप से मानेगें तो उसका कभी विनाश नहीं होगा , और असत् रूप में मानेगें तो उसका कभी जन्म नहीं होगा। जैसे दीपक बुझने के बाद भी नष्ट नहीं होता बल्कि अंधकार रूप पर्याय को धारण करते हुये अपना अस्तित्व रखता है। यदि नष्ट हो जाता तो पुनः प्रकाश कैसे होता ?
           ऐसे ही परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मों का कथन करना ही अनेकांत है। यदि हमारे विचारों में अनेकांत होगा तो वस्तु का सत्य स्वरूप समझने में आसानी होगी।
          
*वाणी में स्याद्वाद*
                 स्यात् + वाद = स्याद्वाद। स्यात् यनि कथंचित् और वाद यानि कथन करना।
                अनेकांतमयी वस्तु को कथन करने की पद्धति का नाम स्याद्वाद है। किसी भी एक शब्द या वाक्य के द्वारा वस्तु का समग्र कथन करना संभव नहीं है , प्रयोजन की मुख्यता से अन्य धर्मों को गौण करते हुये एक धर्म का कथन करना स्याद्वाद है।
          वस्तु के अन्य धर्मों का निषेध न हो जाये इसलिये अनेकांत वादी स्यात् यानि कथंचित् शब्द का प्रयोग करते हैं। जैसे वस्तु कथंचित् सत् और कथंचित् असत् , कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य है। जैसे द्रव्य रूप से वस्तु नित्य है और पर्याय रूप से अनित्य ।
              वाणी में स्याद्वाद होने से कभी कोई विवाद खड़ा नहीं होगा। 
 
 *जीवन में अपरिग्रह*   
                   अ + परिग्रह अर्थात् परिग्रह का अभाव। 
        आचार्य उमास्वामी के अनुसार *मूर्च्छा परिग्रहः* यानि ममत्व का परिणाम अर्थात् ये मेरा है — ऐसा भाव परिग्रह है , और ऐसा भाव न होना ही अपरिग्रह है। 
        परिग्रह 24 प्रकार का —
14 प्रकार का अंतरंग ( मिथ्यात्व, क्रोध, मान,माया,लोभ और हास्यादि नोकषाय) और 10 प्रकार का बहिरंग ( क्षेत्र,वास्तु,सोना,चाँदी,धन,धान्य,दास,दासी,वस्त्र और बर्तन)
            लेकिन जैन दर्शन में अंतरंग परिग्रह के त्याग को ही श्रेष्ठ माना गया है। अंतरंग परिग्रह के त्याग बिना बाह्य परिग्रह के त्याग का कोई मूल्य नहीं है।
            जीवन में अपरिग्रह का होना बहुत जरूरी है। क्यों कि व्यक्ति की इच्छायें असीम व अनंत है, उन पर नियंत्रण रखने के लिये और शांति पूर्वक जीवन जीने के लिये अपरिग्रह का होना अति अावश्यक है।
–डॉ रंजना जैन दिल्ली
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