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जिनधर्म के संस्कारो को मत छोड़ना

हंस और परमहंस नामक दो भाई थे। अकलंक जिसे एक ही बार में याद हो जाता और हंस को दुबारा कहने से याद हो जाता है। ऐसे प्रखर बुद्धि के धनी दोनों बालको में जिनधर्म के संस्कार थे। बचपन में ही ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था। इस बात से अनजान पिता ने उनके विवाह की तैयारी करने लगे परन्तु अपने …

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गधे की कहानी

किसी समय एक जंगल में गधे ही गधे रहते थे। पूरी आजादी से रहते, भरपेट खाते-पीते और मौज करते थे। एक लोमड़ी को मजाक सूझा। उसने मुँह लटकाकर गधों से कहा- मैं अपने कानों से सुनकर और आँखों देखकर आई हूँ। मछलियों ने एक सेना बना ली है और वे अब तुम्हारे ऊपर चढ़ाई करने ही वाली हैं। उनके सामने …

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चरित्र

पिता को अनाथश्रम मे छोड़कर पुत्र बाहर निकला ही था कि पत्नी का फोन आ गया, यह जानने के लिए कि पर्व त्योहार मे छुट्टी वगेरह का नियम तो नही हैं न? पुत्र वापस अनाथाश्रम पहुँचकर देखता हैं उसके पिता बड़े प्रेम से वृद्धाश्रम के मेनेजर से बात कर रहे हैं। पुत्र को शंका होने लगी की शिकायत हो रही …

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Communication between God Statue and Marble

एक ट्रक में मारबल का सामान जा रहा था, उसमे टाईल्स भी थी और भगवान की मूर्ती भी। रास्ते में टाईल्स ने मूर्ती से पूछा भाई ऊपर वाले ने हमारे साथ ऐसा भेद-भाव क्यों किया है? मूर्ती ने पूछा, कैसा भेद भाव? टाईल्स ने कहा, तुम भी पथ्थर मै भी पथतर, तुम भी उसी खान से निकले, मै भी, तुम्हे …

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Jain Life Style and Its Scientific Development

Jain Life Style and Its Scientific Development – An article by Dr ShudhatamPrakash Jain   Want to know what what is the scientific logic for each and every activities which are done by Jain People. Here is an article which can brief you about, Really a nice article. Have a look !! JainLifeStyleandItsScientificDevelopment

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A Jain perspective on Food, Fasting and Liberation

Have you ever wondered why there is so much restriction in Jainism related to food? Why can’t we eat that, why can’t we do that? If yes, then here is an article for you : Non-violence as a core philosophy and a vegetarian diet as one of its outcomes are the two most well-known aspects of the Jain community. Practicing …

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Jeevan Parichay

आचार्य श्री १०८ विरागसागर जी महाराज भारत वर्ष की पावन भूमि सदैव नर रत्नों की जन्म दात्री रही है,जहाँ पर तीर्थंकरों ,यतिवरो तथा महापुरुषों ने जन्म लेकर पुरुषार्थ द्वारा ,त्याग ,तपस्या के माध्यम से अपना आत्म कल्याण किया।इस श्रंखला में आचार्य श्री विराग सागर जी ने जन्म लेकर इस वसुंधरा को गोरवान्वित किया।मध्य क्षेत्र के पथरिया दमोह जिला ,म.प्र. नगर …

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